कृष्ण यजुर्वेद · ३ वल्ली

तैत्तिरीय उपनिषद्

"सत्यं वद, धर्मं चर" का शिक्षा-वल्ली उपदेश, पञ्चकोश का वर्णन (अन्नमय से आनन्दमय तक) एवं भृगु ऋषि की तपस्या से ब्रह्म-प्राप्ति।

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शिक्षा वल्ली — उच्चारण से आचरण तक

तैत्तिरीय उपनिषद्, कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से सम्बद्ध, तीन वल्लियों में विभक्त है, और इसकी पहली वल्ली का नाम "शिक्षा" है — अर्थात् वैदिक उच्चारण-शास्त्र। यह अपने-आप में उल्लेखनीय है कि एक गहन दार्शनिक उपनिषद् वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम (लय) और संतान (शब्दों के परस्पर सम्बन्ध) — इन छह अंगों के विस्तृत वर्णन से आरम्भ होती है। यह इस बात का प्रतीक है कि भारतीय परम्परा में शब्द और ध्वनि को कोई गौण वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं ब्रह्म-प्राप्ति का एक साधन माना गया — सही उच्चारण से मंत्र की शक्ति अक्षुण्ण रहती है, और यह शक्ति साधक की चेतना को भी परिष्कृत करती है।

इसके पश्चात् एक अत्यन्त सुंदर प्रार्थना आती है — "आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि॥" — मेरे अंग, वाणी, प्राण, नेत्र, कर्ण, बल और समस्त इन्द्रियाँ पुष्ट हों। यह प्रार्थना दिखाती है कि उपनिषद् शरीर और इन्द्रियों को तुच्छ नहीं मानती — इसके विपरीत, वह इन्हें आत्म-ज्ञान की साधना के उपकरण के रूप में सशक्त और स्वस्थ बनाए रखने की कामना करती है, क्योंकि एक दुर्बल शरीर और अस्वस्थ इन्द्रियों के साथ गहन साधना सम्भव नहीं।

इसके बाद "संहिता उपासना" का विवरण आता है — यह सिखाता है कि किस प्रकार भिन्न-भिन्न लोकों (पृथ्वी-अंतरिक्ष-द्युलोक), ज्योतियों (अग्नि-वायु-आदित्य), वेदों (ऋक्-यजुः-साम), प्राणियों (माता-पिता-संतान) और स्वयं शरीर (नीचला-ऊपरी जबड़ा, वाणी-जिह्वा) के बीच के "संधि" (मिलन-बिंदु) का ध्यान किया जाए। यह उपासना-पद्धति यह सिखाती है कि दो प्रतीत होने वाले भिन्न तत्त्वों के बीच का सेतु ही वह स्थान है जहाँ एकत्व की अनुभूति सबसे सघन होती है — जैसे दो शब्दों का सन्धि-बिंदु, दो लोकों का मिलन-बिंदु।

इस वल्ली का सर्वाधिक प्रसिद्ध अंश वह "दीक्षांत उपदेश" (कन्वोकेशन एड्रेस) है, जो गुरुकुल की शिक्षा पूर्ण कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने वाले शिष्य को दिया जाता है — "सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः॥" — सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। आगे कहा गया है — "मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥" — माता को देवता समान मानो, पिता को देवता समान मानो, आचार्य को देवता समान मानो, अतिथि को देवता समान मानो। यह उपदेश केवल आध्यात्मिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण जीवन-आचार-संहिता है, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी हजारों वर्ष पूर्व थी।

यह उपदेश आगे कहता है — केवल वे ही कर्म करो जो निर्दोष हों, अन्य नहीं; जो आचरण हममें श्रेष्ठ माना जाए, वही तुम भी अपनाओ; जो कोई ब्राह्मण धर्म-संकट में हों, उनके प्रति श्रद्धा और उदारता से आचरण करो; और दान श्रद्धा से, प्रसन्नता से, विनम्रता से और सहानुभूतिपूर्वक दो। इस प्रकार शिक्षा वल्ली ध्वनि-विज्ञान से आरम्भ होकर, उपासना-पद्धति से गुज़रते हुए, अंततः एक सम्पूर्ण नैतिक जीवन-दर्शन में परिणत हो जाती है — यह दिखाते हुए कि सही उच्चारण और सही आचरण, दोनों ही उस एक सामंजस्य की खोज हैं जो अंततः ब्रह्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है।

इस अध्याय का सार

सत्य बोलना, धर्माचरण करना, और माता-पिता-आचार्य-अतिथि को देवता समान मानना — यही वह जीवन-आचार-संहिता है जिस पर तैत्तिरीय उपनिषद् की सम्पूर्ण आध्यात्मिक इमारत खड़ी है।

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ब्रह्मानन्द वल्ली — पंचकोश और आनंद की गणना

दूसरी वल्ली इस उद्घोष से आरम्भ होती है — "ब्रह्मविदाप्नोति परम्" — ब्रह्म को जानने वाला परम पद को प्राप्त करता है; और इसी सन्दर्भ में ब्रह्म की वह प्रसिद्ध परिभाषा दी जाती है — "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" — सत्य, ज्ञान और अनन्त — यही ब्रह्म है। जो साधक हृदय की गुहा में, परम आकाश में स्थित इस ब्रह्म को जान लेता है, वह सर्वज्ञ ब्रह्म के साथ ही समस्त कामनाओं को एक साथ भोगता है। इसके पश्चात् एक संक्षिप्त सृष्टि-क्रम वर्णित होता है — उस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से औषधियाँ (वनस्पतियाँ), औषधियों से अन्न, और अन्न से यह मनुष्य-शरीर उत्पन्न हुआ।

इसी सृष्टि-क्रम के आधार पर उपनिषद् मनुष्य के पाँच कोशों (सूक्ष्म आवरणों) का प्रसिद्ध वर्णन प्रस्तुत करती है, जो एक-दूसरे के भीतर, प्याज़ की परतों की भाँति, समाए हुए हैं। सबसे बाहरी है अन्नमय कोश — यह स्थूल, भौतिक शरीर है, जो अन्न से बना और अन्न से ही पोषित होता है। इसके भीतर प्राणमय कोश है — यह वही श्वास-शक्ति है जो अन्नमय कोश को जीवंत रखती है, स्वयं मनुष्य के आकार की ही, पाँच प्राणों में विभक्त। इसके भीतर मनोमय कोश है — यह मन, संकल्प-विकल्प और भावनाओं का क्षेत्र है, जिसका सिर स्वयं यजुर्वेद कहा गया है।

इससे भी सूक्ष्म विज्ञानमय कोश है — यह बुद्धि, विवेक और निर्णय-शक्ति का क्षेत्र है, जिसका आधार श्रद्धा कही गई है। और सबसे भीतर, सबसे सूक्ष्म आनन्दमय कोश है — इसका सिर "प्रिय" (स्नेह) है, दाहिना पक्ष "मोद" (हर्ष) है, बायाँ पक्ष "प्रमोद" (परम हर्ष) है, मध्य (आत्मा-स्वरूप) "आनन्द" स्वयं है, और इसकी पूँछ अर्थात् आधार स्वयं ब्रह्म है। यह पंचकोश-सिद्धान्त आगे के वेदान्त-दर्शन में मनुष्य की संरचना को समझने का मूल ढाँचा बन गया — यह दिखाते हुए कि शरीर से लेकर बुद्धि तक सब कुछ आत्मा नहीं, बल्कि आत्मा के क्रमशः सूक्ष्मतर आवरण मात्र हैं, और वास्तविक आत्मा इन सबसे भी परे, सबसे भीतर स्थित है।

इस वल्ली का एक अत्यन्त विलक्षण अंश "आनंद-मीमांसा" है — सुखों की एक गणितीय शृंखला, जो मानव-सुख से आरम्भ होकर ब्रह्मानंद तक पहुँचती है। एक युवा, सुशिक्षित, बलवान, संसार के समस्त ऐश्वर्य से सम्पन्न मनुष्य का सुख — यह मानव-आनंद की एक इकाई है। इससे सौ गुना अधिक मनुष्य-गंधर्वों का आनंद है; उससे सौ गुना अधिक देव-गंधर्वों का; उससे सौ गुना अधिक पितरों के दीर्घकालीन लोक का; इस प्रकार क्रमशः आजानज देवताओं, कर्मदेवताओं, देवताओं, इन्द्र, बृहस्पति और प्रजापति तक — प्रत्येक स्तर पर आनंद सौ गुना बढ़ता जाता है, और अंततः ब्रह्म का आनंद इन सबसे परे, अमाप्य है।

यह गणना केवल एक काल्पनिक अभ्यास नहीं — इसका गहन सन्देश यह है कि मनुष्य जिन सांसारिक सुखों को सर्वोच्च मानकर उनके पीछे भागता है, वे वास्तव में उस अनंत आनंद की तुलना में अत्यन्त तुच्छ हैं जो आत्म-साक्षात्कार में उपलब्ध है। जो व्यक्ति ब्रह्म को जान लेता है, वह किसी भी अशुभ कर्म के विषय में यह सोचकर व्यथित नहीं होता — "मैंने अच्छा क्यों नहीं किया, बुरा क्यों किया" — क्योंकि वह जान चुका होता है कि आत्मा इन दोनों से परे है; यह ज्ञान ही उसे समस्त भय और पश्चाताप से मुक्त कर देता है।

इस अध्याय का सार

मनुष्य पाँच कोशों — अन्नमय से आनन्दमय तक — की परतों में लिपटा है, और इन सबसे सूक्ष्म आनन्दमय कोश के भी आधार में स्वयं ब्रह्म है, जिसका आनंद संसार के सबसे बड़े सुख से भी अनंत गुना श्रेष्ठ है।

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भृगु वल्ली — तप से आत्म-अन्वेषण

तीसरी वल्ली एक जीवंत कथा प्रस्तुत करती है — भृगु ऋषि, जो वरुण के पुत्र हैं, अपने पिता के पास जाकर कहते हैं — "भगवन्, मुझे ब्रह्म सिखाइए।" वरुण उन्हें ब्रह्म की खोज के लिए एक सूत्र देते हैं, स्वयं परिभाषा नहीं — "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व, तद्ब्रह्म॥" — जिससे ये समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिससे उत्पन्न होकर वे जीवित रहते हैं, और मृत्यु के पश्चात् जिसमें वे पुनः प्रवेश करते हैं — उसे जानने की इच्छा करो, वही ब्रह्म है। यह सूत्र किसी सीधे उत्तर के बजाय एक अन्वेषण-विधि प्रस्तुत करता है — भृगु को स्वयं तप के द्वारा इस उत्तर तक पहुँचना होगा।

भृगु तप करते हैं, और पहला निष्कर्ष निकालते हैं — अन्न (भोजन/पदार्थ) ही ब्रह्म है, क्योंकि प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं, अन्न से ही जीवित रहते हैं, और अंततः अन्न में ही (पृथ्वी में मिलकर) विलीन हो जाते हैं। संतुष्ट न होकर, वे पुनः अपने पिता के पास जाते हैं, और वरुण उन्हें पुनः तप करने का निर्देश देते हैं। इस बार भृगु प्राण (जीवन-शक्ति) को ब्रह्म के रूप में पहचानते हैं — क्योंकि अन्न भी प्राण के बिना निष्प्राण मात्र है, प्राण ही वह है जो अन्न को जीवंत शरीर में परिणत करता है। परन्तु यह भी अंतिम उत्तर नहीं निकलता, और वरुण उन्हें पुनः तप में भेज देते हैं।

इस प्रकार भृगु क्रमशः गहनतर सत्यों की खोज करते हैं — तीसरे चरण में वे मन को ब्रह्म मानते हैं, क्योंकि प्राण भी मन के संकल्प द्वारा ही निर्देशित होता है; चौथे चरण में वे विज्ञान (बुद्धि, विवेक-शक्ति) को ब्रह्म मानते हैं, क्योंकि मन भी बुद्धि के नियंत्रण में कार्य करता है। परन्तु प्रत्येक बार पिता का वही उत्तर मिलता है — "तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व, तपो ब्रह्मेति" — तप के द्वारा ही ब्रह्म को जानने की इच्छा करो, तप ही ब्रह्म है — और भृगु पुनः गहन तप में लीन हो जाते हैं। यह क्रमिक प्रक्रिया स्वयं इस बात की शिक्षा है कि आत्म-ज्ञान कोई एक बार में प्राप्त होने वाला उत्तर नहीं, बल्कि परत-दर-परत, धैर्यपूर्वक गहराई में उतरने की यात्रा है।

अंततः पाँचवें और अंतिम चरण में भृगु आनंद को ब्रह्म के रूप में पहचानते हैं — "आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्" — क्योंकि विज्ञान (बुद्धि) भी अंततः उस आनंद की खोज में ही कार्यरत रहती है जो स्वयं सबका परम लक्ष्य है, और जिससे परे कुछ भी शेष नहीं रहता। इस अंतिम अनुभूति के साथ भृगु उसी परिणाम तक पहुँचते हैं जो ब्रह्मानंद वल्ली में पहले ही वर्णित हो चुका था — यह "भार्गवी वारुणी विद्या" कहलाई, और यह परम आकाश में, हृदय में प्रतिष्ठित मानी गई। यह पूरी कथा अन्नमय से आनन्दमय तक के पंचकोशों की ही एक जीवंत, अनुभवजन्य पुनरावृत्ति है — एक सिद्धान्त के रूप में नहीं, बल्कि एक साधक की व्यक्तिगत तप-यात्रा के रूप में।

उपनिषद् का समापन अन्न की महिमा के अनूठे उपदेशों से होता है — "अन्नं न निन्द्यात्, तद्व्रतम्" — अन्न की निंदा मत करो, यह एक व्रत है; अन्न को बढ़ाओ, त्यागो मत, यह भी एक व्रत है; अन्न को कभी वापस मत भेजो (अर्थात् आगंतुक को सदा भोजन कराओ), यह भी व्रत है। यह उपदेश भृगु की गहन तात्त्विक खोज को पुनः धरातल पर, दैनिक जीवन के व्यावहारिक आचरण में उतार देता है — भले ही अंतिम सत्य आनंद हो, परन्तु उस आनंद तक पहुँचने का मार्ग अन्न, प्राण, मन और बुद्धि के प्रति सम्मान और उचित देखभाल से होकर ही जाता है। यह उपनिषद् की एक अद्वितीय विशेषता है कि वह दार्शनिक ऊँचाइयों से लौटकर सदैव व्यावहारिक, दैनिक जीवन की भूमि पर पुनः खड़ी हो जाती है।

इस अध्याय का सार

अन्न से प्राण, प्राण से मन, मन से बुद्धि, और बुद्धि से आनंद तक — भृगु की तप-यात्रा दिखाती है कि आत्म-ज्ञान कोई तात्कालिक उत्तर नहीं, बल्कि परत-दर-परत गहराई में उतरने का धैर्यपूर्ण अभ्यास है।