अथर्ववेद · ६ प्रश्न

प्रश्न उपनिषद्

छह जिज्ञासु शिष्यों के छह प्रश्नों पर पिप्पलाद ऋषि का उत्तर — प्राण-रयि, पंच-प्राण, स्वप्न-सुषुप्ति, ॐ की उपासना एवं षोडश-कला पुरुष।

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प्रश्न प्रथम — रयि और प्राण (कबन्धी काात्यायन)

प्रश्न उपनिषद् की शैली शेष उपनिषदों से भिन्न है — यह छह जिज्ञासु शिष्यों और एक गुरु, ऋषि पिप्पलाद, के बीच छह क्रमबद्ध प्रश्नोत्तरों में संरचित है, इसीलिए इसका नाम "प्रश्न" पड़ा। सुकेशा, सत्यकाम, गार्ग्य, कौसल्य, भार्गव और कबन्धी — ये छह ब्रह्मनिष्ठ शिष्य ब्रह्म की खोज में पिप्पलाद ऋषि के पास पहुँचते हैं, एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य और तप का पालन करते हैं, और तब गुरु उन्हें प्रश्न पूछने की अनुमति देते हैं — यह स्वयं इस बात का प्रतीक है कि गूढ़ ज्ञान बिना साधना और अनुशासन के प्राप्त नहीं होता।

पहला प्रश्न कबन्धी काात्यायन पूछते हैं — "भगवन्, ये प्रजाएँ कहाँ से उत्पन्न होती हैं?" पिप्पलाद उत्तर देते हैं कि प्रजापति ने संतान की इच्छा से तप किया, और रयि (जड़ पदार्थ, चंद्रमा से सम्बद्ध) तथा प्राण (जीवन-शक्ति, सूर्य से सम्बद्ध) — इस युगल को उत्पन्न किया, यह सोचकर कि ये दोनों मिलकर विविध प्रकार की प्रजाएँ उत्पन्न करेंगे। जो कुछ भी रूपवान है, वह रयि है; जो कुछ निराकार, गतिमान है, वह प्राण है। यह सृष्टि की एक अत्यन्त प्राचीन द्वैत-व्याख्या है — पदार्थ और ऊर्जा, स्थूल और सूक्ष्म, स्त्री और पुरुष तत्त्व — जो मिलकर ही समस्त सृष्टि की विविधता को जन्म देते हैं।

इसके बाद पिप्पलाद वर्ष के दो मार्गों का वर्णन करते हैं — दक्षिणायन और उत्तरायण। जो लोग कर्मकाण्ड और यज्ञ के द्वारा पुण्य अर्जित करते हैं, वे दक्षिणायन के मार्ग से चन्द्रलोक को प्राप्त होते हैं — वहाँ वे अपने पुण्यों का फल भोगकर पुनः पृथ्वी पर लौट आते हैं, यह "पितृयान" (पितरों का मार्ग) कहलाता है। परन्तु जो लोग तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और आत्म-ज्ञान से जीवन बिताते हैं, वे उत्तरायण के मार्ग से सूर्यलोक को, और वहाँ से ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं — यह "देवयान" (देवताओं का मार्ग) कहलाता है, और इस मार्ग से गए हुए साधक पुनः संसार में नहीं लौटते। यह द्विविध मार्ग-व्यवस्था कर्मकाण्ड और ज्ञान-मार्ग, दोनों को उनका उचित स्थान देती है, बिना एक को पूर्णतः निरर्थक घोषित किए।

इस प्रश्न का गहनतम सन्देश यह है कि सृष्टि का सम्पूर्ण विस्तार — वर्ष, ऋतुएँ, रात-दिन, अन्न, वीर्य — सभी इसी रयि-प्राण के मौलिक युगल से उत्पन्न हुए मानकर देखे जा सकते हैं। प्रजापति स्वयं ही वर्ष के रूप में समझे जाते हैं, जिसके दो मार्ग — दक्षिण और उत्तर — मनुष्य के कर्म और ज्ञान के दो मार्गों के भी प्रतीक बन जाते हैं। पिप्पलाद इस प्रकार पहले ही प्रश्न में सृष्टि-विज्ञान (कॉस्मोलॉजी) को जीवन के व्यावहारिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन से जोड़ देते हैं।

इस अध्याय का सार

जो कर्मकाण्ड से जीवन बिताते हैं वे पितृयान से लौट आते हैं, परन्तु जो तप और ज्ञान से जीते हैं वे देवयान से ब्रह्मलोक को प्राप्त होकर पुनः नहीं लौटते।

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प्रश्न द्वितीय — प्राण की सर्वोच्चता (भार्गव वैदर्भि)

दूसरा प्रश्न भार्गव वैदर्भि पूछते हैं — कितने देवता इस शरीर को धारण करते हैं, वे अपनी शक्ति किस प्रकार दिखाते हैं, और इनमें श्रेष्ठ कौन है? पिप्पलाद उत्तर देते हैं कि आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी, मन, नेत्र और श्रोत्र — ये सभी अपने-अपने को शरीर का धारक मानकर गर्व करते हैं, प्रत्येक यह दावा करता है कि "मेरे ही सहारे यह शरीर टिका है।" यह ठीक वैसा ही दृश्य है जैसा केन उपनिषद् में अग्नि और वायु के अहंकार-भंग की कथा में देखा गया — यहाँ भी शरीर की विभिन्न शक्तियाँ अपने-अपने महत्त्व का दावा करती हैं।

इस विवाद को शान्त करने के लिए प्राण (मुख्य जीवन-शक्ति) स्वयं आगे आता है और घोषणा करता है कि वह ही इन सबका आधार है — इसे सिद्ध करने के लिए वह शरीर से उठकर जाने का उपक्रम करता है। जैसे ही प्राण उठने लगता है, शेष सभी इन्द्रियाँ — वाणी, मन, नेत्र, श्रोत्र — भी अपने-अपने स्थान से उखड़ने लगती हैं, ठीक वैसे ही जैसे मधुमक्खियाँ अपनी रानी के छत्ता छोड़ते ही व्याकुल होकर बिखर जाती हैं। यह देखकर सभी इन्द्रियाँ प्राण के सम्मुख नतमस्तक होकर उसकी स्तुति करती हैं और स्वीकार करती हैं कि वही सबसे श्रेष्ठ है।

पिप्पलाद प्राण की महिमा का वर्णन करते हुए उसकी तुलना विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों से करते हैं — प्राण ही अग्नि के रूप में जलता है, सूर्य के रूप में चमकता है, पर्जन्य (मेघ) के रूप में वर्षा करता है, इन्द्र, वायु और पृथ्वी के रूप में कार्य करता है — वह स्थूल और सूक्ष्म, दोनों रूपों में विद्यमान है, अमृत भी वही है। जो शरीर में प्राण का यह सर्वव्यापी, सर्वाधार रूप जान लेता है, उसकी सन्तान कभी प्राणहीन (अकाल-मृत्यु को प्राप्त) नहीं होती, और वह स्वयं अमरत्व को प्राप्त होता है।

इस प्रश्न की गहन शिक्षा यह है कि शरीर की समस्त शक्तियाँ — चाहे वे कितनी भी विशिष्ट और शक्तिशाली प्रतीत हों — अंततः एक ही मूल जीवन-शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं। आँख देखने का दावा कर सकती है, कान सुनने का, वाणी बोलने का, परन्तु यदि प्राण ही शरीर छोड़ दे, तो ये सभी शक्तियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं। यह शिक्षा हमें यह स्मरण कराती है कि हमारी वैयक्तिक उपलब्धियों और क्षमताओं के मूल में भी एक साझा, गहरी जीवन-शक्ति कार्य करती है, जिसका सम्मान और जिसकी देखभाल हमारी सबसे बड़ी शक्तियों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।

इस अध्याय का सार

शरीर की समस्त इन्द्रियाँ और शक्तियाँ अपने-अपने महत्त्व का दावा करती हैं, परन्तु जब प्राण स्वयं उठ खड़ा होता है, तो सब कुछ उसी के अधीन सिद्ध होता है — वही सबका सच्चा आधार है।

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प्रश्न तृतीय — पंच प्राण (कौसल्य आश्वलायन)

तीसरा प्रश्न कौसल्य आश्वलायन पूछते हैं — प्राण कहाँ से उत्पन्न होता है, यह शरीर में कैसे प्रवेश करता है, यह स्वयं को कैसे विभाजित करता है, और यह शरीर से किस मार्ग से बाहर जाता है? पिप्पलाद बताते हैं कि प्राण आत्मा से उत्पन्न होता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी पुरुष की छाया उसी से उत्पन्न होकर उसका अनुसरण करती है — यह मन के संकल्प द्वारा शरीर में प्रवेश करता है, जैसे कोई राजा अपने अधिकारियों को विभिन्न प्रान्तों में नियुक्त करता है, वैसे ही प्राण स्वयं को शरीर के विभिन्न भागों में पाँच रूपों में विभाजित कर देता है।

इन पाँच प्राणों का विस्तृत वर्णन इस प्रश्न का केन्द्र है। मुख्य प्राण नेत्र, कर्ण, मुख और नासिका के क्षेत्र में रहकर श्वास-प्रश्वास का कार्य करता है। अपान निम्न अंगों में स्थित होकर मल-मूत्र और उत्सर्जन की क्रिया सम्भालता है। समान शरीर के मध्य भाग में स्थित रहकर खाए गए अन्न को समान रूप से ("सम" रूप से नयन करने के कारण "समान") सम्पूर्ण शरीर में वितरित करता है, मानो एक आंतरिक अग्नि की भाँति भोजन को पचाकर सप्त ज्वालाओं (रस, रक्त, मांस आदि सप्त धातुओं) में बदल देता है। उदान ऊपर की ओर गति करता है — मृत्यु के समय यही प्राण सुषुम्ना नाड़ी से होकर ऊपर उठता है और साधक के संचित पुण्य-पाप के अनुसार उसे उत्तम या निम्न लोकों में ले जाता है। और व्यान सम्पूर्ण शरीर में, सभी नाड़ियों में व्याप्त रहकर उन कार्यों को सम्भव बनाता है जिनमें विशेष बल की आवश्यकता होती है — जैसे धनुष खींचना।

यह पंच-प्राण-विद्या शरीर-विज्ञान और आध्यात्म का एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है — यह दिखाती है कि जो एक अदृश्य जीवन-शक्ति समस्त शरीर को चला रही है, वह किसी एक स्थान पर सीमित नहीं, बल्कि पाँच विशिष्ट कार्यों में विभाजित होकर शरीर के हर भाग को व्यवस्थित रखती है — श्वास, उत्सर्जन, पाचन, मृत्यु के समय की गति, और शारीरिक बल — सभी एक ही मूल शक्ति के भिन्न-भिन्न प्रकटीकरण हैं।

पिप्पलाद इस प्रश्न को समाप्त करते हुए कहते हैं कि जो साधक प्राण की इस उत्पत्ति, इसके प्रवेश, इसके पाँच-भागों में विभाजन, और शरीर के भीतर व इन्द्रियों के साथ इसके सम्बन्ध को भली-भाँति जान लेता है, वह स्वयं अमरत्व को प्राप्त करता है। इस ज्ञान का महत्त्व केवल सैद्धांतिक नहीं — जो साधक अपने ही श्वास और शरीर की इन आंतरिक प्रक्रियाओं के प्रति सजग हो जाता है, वह धीरे-धीरे यह अनुभव करने लगता है कि उसका शरीर किसी यांत्रिक ढाँचे से कहीं अधिक, एक जीवंत, चेतन व्यवस्था है, जो उसी परम चेतना द्वारा संचालित है जिसकी खोज सम्पूर्ण उपनिषद् करती है।

इस अध्याय का सार

एक ही प्राण-शक्ति शरीर में पाँच रूपों में — श्वास, उत्सर्जन, पाचन, मृत्यु-गति और बल के रूप में — कार्य करती है, जो इसे समझ लेता है वह शरीर को यांत्रिक नहीं, चेतन-व्यवस्था के रूप में देखने लगता है।

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प्रश्न चतुर्थ — स्वप्न और सुषुप्ति (सौर्यायणि गार्ग्य)

चौथा प्रश्न सौर्यायणि गार्ग्य पूछते हैं — मनुष्य में कौन सोता है, कौन जागता रहता है, कौन-सा देवता स्वप्न देखता है, यह सुख किसे प्राप्त होता है, और अंततः ये सब किसमें प्रतिष्ठित हैं? यह प्रश्न नींद और स्वप्न के रहस्य में सीधे उतरता है, एक ऐसा विषय जिसे उपनिषदों ने बार-बार आत्म-ज्ञान की कुंजी के रूप में प्रयोग किया है। पिप्पलाद उत्तर देते हैं कि जिस प्रकार अस्त होते सूर्य की किरणें उसी के गोलक में समा जाती हैं और उदय होने पर पुनः फैल जाती हैं, उसी प्रकार गहरी निद्रा में समस्त इन्द्रियाँ मन में समा जाती हैं — इसीलिए सोया हुआ व्यक्ति न सुनता है, न देखता है, न सूँघता-चखता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न सुख भोगता है, न त्याग करता है, न चलता है।

गहरी निद्रा में व्यक्ति "पुरीतत्" नामक हृदय के समीप स्थित नाड़ी-क्षेत्र में समस्त प्राणों से घिरा हुआ विश्राम करता है। परन्तु स्वप्न-अवस्था में मन अकेला ही सक्रिय हो उठता है — वह पूर्व में देखी और सुनी हुई वस्तुओं के आधार पर, एक कुशल शिल्पकार की भाँति, अनेक नए दृश्य और अनुभव रच लेता है। मन यहाँ "प्रकाशक" कहलाता है, क्योंकि स्वप्न में जो कुछ दिखाई देता है, वह प्राण के ही प्रकाश से प्रकाशित होता है — बाह्य नेत्र बंद होने पर भी आंतरिक द्रष्टा सक्रिय रहता है, यह इस बात का प्रमाण है कि देखने की वास्तविक शक्ति आँख में नहीं, प्राण-चेतना में निहित है।

गहन सुषुप्ति (स्वप्न-रहित गहरी नींद) की अवस्था में यह मन भी शान्त हो जाता है, और साधक उस समय सर्वाधिक शान्ति और सुख का अनुभव करता है — यद्यपि जागने पर उसे इसका स्मरण नहीं रहता। पिप्पलाद इसकी तुलना पक्षियों से करते हैं जो दिनभर विचरण करने के पश्चात् संध्या समय अपने वृक्ष पर लौट आते हैं — ठीक वैसे ही, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार — ये सभी गहरी निद्रा में उस परम आत्मा में लौट आते हैं, विश्राम पाते हैं। यह रूपक अत्यन्त सुंदर है — यह बताता है कि हमारी प्रतिदिन की गहरी नींद वास्तव में एक लघु-प्रलय है, जिसमें हम अनजाने में ही प्रतिदिन अपने मूल स्रोत में विश्राम कर आते हैं।

पिप्पलाद इस प्रश्न को इस उद्घोष से समाप्त करते हैं कि जो इस अक्षर, अविनाशी तत्त्व को — जिसमें जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों अवस्थाएँ प्रतिष्ठित हैं — भली-भाँति जान लेता है, वह स्वयं भी अविनाशी हो जाता है। यह प्रश्न आगे माण्डूक्य उपनिषद् में और भी सूक्ष्म, सुव्यवस्थित रूप में विस्तारित होने वाले चतुष्पाद-सिद्धान्त (जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति-तुरीय) की नींव रखता है — यह दिखाते हुए कि रोज़ की तीन साधारण अवस्थाएँ भी, यदि गहराई से समझी जाएँ, तो आत्म-ज्ञान का सीधा द्वार बन सकती हैं।

इस अध्याय का सार

प्रतिदिन की गहरी नींद वास्तव में एक लघु-प्रलय है, जिसमें पंच-तत्त्व, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि — सब कुछ उस परम आत्मा में विश्राम पाकर लौट आते हैं, जैसे पक्षी संध्या को अपने वृक्ष पर लौटते हैं।

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प्रश्न पंचम — ॐ की उपासना (शैब्य सत्यकाम)

पाँचवाँ प्रश्न शैब्य सत्यकाम पूछते हैं — जो मनुष्य जीवन-भर ॐ का ध्यान करते हुए प्राण त्यागे, वह किस लोक को प्राप्त होता है? पिप्पलाद उत्तर देते हैं कि ॐ ही परा (उच्चतर) और अपरा (निम्नतर) ब्रह्म, दोनों का प्रतीक है — इसलिए इसकी उपासना का फल इस बात पर निर्भर करता है कि साधक इसकी कितनी मात्राओं (अ-उ-म) को समझकर उसका ध्यान करता है। यह प्रश्न ॐ की महिमा को केवल एक ध्वनि-मात्र से उठाकर एक सूक्ष्म साधना-पद्धति के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसका फल साधक की गहराई पर निर्भर करता है।

जो साधक ॐ की केवल एक मात्रा — "अ" — का ध्यान करता है, वह शीघ्र ही पृथ्वी पर पुनः जन्म लेता है, यद्यपि वह ऋचाओं से युक्त होकर मनुष्य-लोक में यश और तेज प्राप्त करता है। जो साधक दो मात्राओं — "अ" और "उ" — का ध्यान करता है, वह मध्यम लोक अर्थात् चन्द्रलोक को प्राप्त होता है, वहाँ ऐश्वर्य का भोग कर पुनः पृथ्वी पर लौट आता है। इस प्रकार, आंशिक ध्यान आंशिक फल ही देता है — यह उपनिषद् की एक महत्वपूर्ण शिक्षा है कि साधना जितनी सम्पूर्ण होगी, फल भी उतना ही सम्पूर्ण होगा।

परन्तु जो साधक ॐ की तीनों मात्राओं — "अ-उ-म" — को पूर्णता से जोड़कर उस परम पुरुष का ध्यान करता है, वह सूर्यलोक को प्राप्त होता है — जैसे सर्प अपनी केंचुली (पुरानी त्वचा) से मुक्त हो जाता है, वैसे ही वह साधक समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। वह उस परम पुरुष को साक्षात् देखता है जो सबसे ऊँचा है, उसी में एकाकार हो जाता है, और ब्रह्मलोक को प्राप्त होकर पुनः संसार में नहीं लौटता। यह "सर्प की केंचुली" वाली उपमा अत्यन्त सजीव है — यह दर्शाती है कि पूर्ण आत्म-ज्ञान से मुक्ति कोई क्रमिक क्षरण नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण, तात्कालिक परिवर्तन है, जैसे साँप अपनी पुरानी त्वचा को पूर्णतः त्याग देता है।

इस प्रश्न की व्यापक शिक्षा यह है कि एक ही प्रतीक — ॐ — साधक की समझ की गहराई के अनुसार भिन्न-भिन्न फल दे सकता है। यह किसी बाहरी पक्षपात का परिणाम नहीं, बल्कि इस स्वाभाविक नियम का प्रतिबिम्ब है कि चेतना जितनी गहराई तक पहुँचती है, फल भी उतना ही गहरा होता है। यह शिक्षा साधक को यह प्रेरणा देती है कि वह अपने मंत्र-जप या ध्यान को केवल यांत्रिक दोहराव न बनाए रखे, बल्कि प्रत्येक स्तर पर उसकी गहनतम अर्थवत्ता को समझने और आत्मसात् करने का प्रयत्न करता रहे।

इस अध्याय का सार

ॐ की एक मात्रा का ध्यान पुनर्जन्म देता है, दो मात्राओं का ध्यान लोक-भोग देता है, परन्तु तीनों मात्राओं का पूर्ण, समन्वित ध्यान ही सर्प की केंचुली-त्याग जैसी सम्पूर्ण मुक्ति देता है।

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प्रश्न षष्ठ — षोडश-कला पुरुष (सुकेशा भारद्वाज)

छठा और अंतिम प्रश्न सुकेशा भारद्वाज पूछते हैं, जो वास्तव में एक राजकुमार हिरण्यनाभ कौसल्य द्वारा पहले पूछे गए प्रश्न को दोहराते हैं — "षोडशकलं पुरुषं", सोलह कलाओं (अंगों) वाला वह पुरुष कहाँ स्थित है? पिप्पलाद उत्तर देते हैं कि वह पुरुष कहीं बाहर नहीं, इसी शरीर के भीतर स्थित है। वह पुरुष स्वयं से यह विचार करता है — किसके चले जाने पर मैं चला जाऊँगा, किसके स्थिर रहने पर मैं स्थिर रहूँगा? और इसी जिज्ञासा से वह प्राण को उत्पन्न करता है।

प्राण से श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन और अन्न उत्पन्न होते हैं; अन्न से बल, तप, मन्त्र (वैदिक ऋचाएँ), कर्म (यज्ञ-कार्य) और लोक उत्पन्न होते हैं, और लोकों में नाम भी सम्मिलित है। यह सृष्टि-क्रम सोलह कलाओं का निर्माण करता है, जो उस पुरुष से उत्पन्न होकर पुनः उसी में विलीन हो जाती हैं। यह सूची पिछले प्रश्नों में वर्णित रयि-प्राण, पंच-प्राण और पंच-भूतों को एक व्यापक संरचना में समाहित कर लेती है — मानो सम्पूर्ण उपनिषद् की शिक्षाओं का सार इस अंतिम प्रश्न में संगृहीत हो गया हो।

इसके पश्चात् वह प्रसिद्ध उपमा आती है जो सम्पूर्ण उपनिषद् की समाप्ति को गौरवान्वित करती है — "यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते" — जैसे बहती हुई नदियाँ समुद्र की ओर प्रवाहित होकर समुद्र में मिलते ही अपना अलग नाम-रूप खो देती हैं, और केवल "समुद्र" कहलाती हैं, ठीक उसी प्रकार इस ज्ञानी पुरुष की सोलह कलाएँ भी उस परम पुरुष को प्राप्त होकर अपना पृथक् नाम-रूप खो देती हैं, और वह स्वयं कला-रहित, अमर हो जाता है।

पिप्पलाद इस उपदेश को यह कहकर समाप्त करते हैं — "एतावदेव, न परमस्ति" — यहीं तक यह ज्ञान है, इससे परे कुछ नहीं है। यह उपनिषद् की अंतिम पंक्ति है, और यह अत्यन्त सारगर्भित है — यह घोषणा करती है कि रयि-प्राण के आरम्भिक द्वैत से लेकर षोडश-कला पुरुष के अंतिम विलय तक, प्रश्न उपनिषद् ने सृष्टि, शरीर, स्वप्न, मृत्यु और मुक्ति — सबका सम्पूर्ण चक्र पूर्ण कर लिया है। छहों शिष्य गुरु पिप्पलाद को प्रणाम करते हैं, और यह उपनिषद् गुरु-शिष्य परम्परा की उसी पवित्रता के साथ समाप्त होती है जिसके साथ यह आरम्भ हुई थी।

इस अध्याय का सार

जैसे नदियाँ समुद्र में मिलकर अपना पृथक् नाम-रूप खो देती हैं, वैसे ही ज्ञानी की सोलह कलाएँ परम पुरुष में विलीन होकर उसे कला-रहित, अमर बना देती हैं — यहीं तक ज्ञान है, इससे परे कुछ नहीं।