कृष्ण यजुर्वेद (मैत्रायणी शाखा) · ७ प्रपाठक

मैत्री उपनिषद्

राजा बृहद्रथ के वैराग्य से आरम्भ, शाकायन्य ऋषि का उपदेश — क्षणभंगुर शरीर में भोग की निरर्थकता, भूतात्मा-शुद्धात्मा का भेद तथा षडंग योग की शिक्षा।

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राजा बृहद्रथ का वैराग्य (प्रपाठक 1)

मैत्री (मैत्रायणी) उपनिषद्, कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा से सम्बद्ध, उपनिषदों में अपेक्षाकृत परवर्ती रचना मानी जाती है, और यह अपनी विषय-वस्तु में सांख्य-योग की शब्दावली को वेदान्त के साथ जोड़ने के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसका आरम्भ राजा बृहद्रथ की कथा से होता है — अपने पुत्र को राजसिंहासन पर स्थापित कर, संसार को अनित्य और असार समझकर, राजा वन में जाकर सूर्य की ओर मुख कर उग्र तप में लीन हो जाते हैं। एक सहस्र दिनों की तपस्या के पश्चात्, तेजस्वी ऋषि शाकायन्य उनके सम्मुख प्रकट होते हैं और वरदान माँगने को कहते हैं।

बृहद्रथ का उत्तर उपनिषद्-साहित्य के सबसे मार्मिक वैराग्य-वचनों में से एक है — "हे भगवन्, मुझे मेरा वास्तविक स्वरूप नहीं पता; कृपया मुझे उसका ज्ञान दीजिए" — और फिर वे अपनी व्यथा प्रकट करते हैं — "इस दुर्गन्धयुक्त, असार शरीर में, जो हड्डी, त्वचा, मांस, मज्जा, वीर्य, रक्त, श्लेष्म, अश्रु और मल-मूत्र का पिण्ड मात्र है, विषय-भोग का क्या प्रयोजन? काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, विषाद, ईर्ष्या से पीड़ित इस शरीर में, प्रिय-वियोग और अप्रिय-संयोग से पीड़ित इस शरीर में, भूख-प्यास, बुढ़ापे, मृत्यु और रोग से घिरे इस शरीर में, भोग का क्या अर्थ?"

राजा आगे कहते हैं — यह सम्पूर्ण संसार, मच्छरों और कीड़ों की भाँति, उत्पन्न होकर नष्ट होता रहता है; परन्तु इनसे भी बड़े राजा — सुद्युम्न, भूरिद्युम्न, इन्द्रद्युम्न, हरिश्चन्द्र, ययाति जैसे महान चक्रवर्ती सम्राट — भी अपने विशाल वैभव को त्यागकर इसी संसार से विदा हो गए। गंधर्व, असुर, यक्ष-राक्षस — इनसे भी महान सत्ताएँ भी नष्ट हो जाती हैं। महासागर सूख जाते हैं, पर्वत-शिखर गिर जाते हैं, ध्रुव-तारा भी अपने स्थान से डिग जाता है — ऐसे नश्वर संसार में भोग का क्या अर्थ, जब भोगने वाला बार-बार लौटकर आता ही रहता है? "हे भगवन्, जल-रहित कुएँ में डूबे हुए मुझे उबार लीजिए; आप ही हमारा उद्धार-मार्ग हैं, आप ही हमारा उद्धार-मार्ग हैं" — इस विनम्र, दोहरी पुकार के साथ यह प्रपाठक समाप्त होता है।

यह आरम्भ अन्य उपनिषदों से भिन्न है — जहाँ अधिकांश उपनिषद् एक जिज्ञासु ब्राह्मण-शिष्य के साथ आरम्भ होते हैं, वहीं यहाँ एक राजा, सांसारिक वैभव और सत्ता के शिखर पर पहुँचकर भी, उसकी नश्वरता से हताश होकर तप का मार्ग चुनता है। यह दिखाता है कि आध्यात्मिक जिज्ञासा किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं — जो व्यक्ति संसार के उतार-चढ़ाव को गहराई से अनुभव कर चुका हो, वह भी उतनी ही तीव्रता से सत्य की खोज में निकल सकता है जितना कोई युवा ब्रह्मचारी विद्यार्थी।

इस अध्याय का सार

जब भोगने वाला बार-बार लौटकर आता ही रहता है, तो नश्वर संसार में भोग का क्या अर्थ? — राजा बृहद्रथ का यह प्रश्न किसी भी युग के, किसी भी अवस्था के जिज्ञासु के हृदय की पुकार है।

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प्रजापति का पंचविध विस्तार और काल-सिद्धान्त (प्रपाठक 2)

बृहद्रथ के इस गहन प्रश्न से प्रसन्न होकर शाकायन्य उपदेश आरम्भ करते हैं — सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ने स्वयं को पाँच प्राणों के रूप में विभक्त कर, समस्त प्राणियों में प्रवेश किया, उन्हें जीवन प्रदान किया। इसके पश्चात् उपनिषद् "भूतात्मा" (तात्त्विक, अनुभवजन्य आत्मा) और शुद्ध आत्मा के बीच का भेद स्पष्ट करती है — भूतात्मा, गुणों (सत्त्व-रज-तम) से अभिभूत होकर, अपने भीतर स्थित नियंता को पहचान नहीं पाता, गुणों की धारा में बहता हुआ, अस्थिर, विक्षिप्त, कामनाओं से भरा हुआ, अहंकार में डूब जाता है — "यह मैं हूँ", "यह मेरा है" — ऐसा सोचकर वह स्वयं को उसी प्रकार बाँध लेता है जैसे कोई पक्षी जाल में स्वयं फँस जाए।

इस भूतात्मा का बंधन इतना गहन हो जाता है कि वह अपने ही कर्मों के फल से अभिभूत होकर, शुभ-अशुभ योनियों में प्रवेश करता है, ऊपर-नीचे भटकता है, सुख-दुःख के द्वंद्वों से अभिभूत रहता है। यह वर्णन सांख्य-दर्शन की भाषा में लिखा गया है, परन्तु इसका उद्देश्य वही है जो अन्य उपनिषदों में भी बार-बार दोहराया गया — अज्ञानवश आत्मा स्वयं को शरीर और मन के साथ तादात्म्य कर बैठती है, और यही तादात्म्य ही संसार-बंधन का मूल कारण है।

इसी प्रपाठक में एक अद्वितीय "काल-सिद्धान्त" प्रस्तुत होता है — ब्रह्म के दो रूप बताए गए हैं: काल (समय) और अकाल (कालातीत)। सूर्य के प्रकट होने से पूर्व जो है, वह अकाल, अंश-रहित है; सूर्य से जो आरम्भ होता है, वह काल है, जो अंशयुक्त है — और काल का रूप ही "वर्ष" है, जिससे समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिसमें वे बढ़ते हैं, और जिसमें वे पुनः विलीन हो जाते हैं। इसलिए वर्ष ही प्रजापति है, वर्ष ही काल है, वर्ष ही अन्न है, वर्ष ही ब्रह्म का नीड़ (घोंसला) है, वर्ष ही आत्मा है।

यह काल-सिद्धान्त उपनिषद्-साहित्य में अपेक्षाकृत दुर्लभ है — अधिकांश उपनिषद् काल को एक गौण, सांसारिक अवधारणा मानते हैं, परन्तु मैत्री उपनिषद् इसे ब्रह्म के ही एक रूप के रूप में गम्भीरता से विश्लेषित करती है। "काल ही सब कुछ को महान आत्मा में पकाता है" — यह कथन बताता है कि समय स्वयं एक सृजनात्मक, परिपक्व करने वाली शक्ति है, न कि केवल क्षय की शक्ति; जो साधक यह समझ लेता है कि समय स्वयं किसमें "पकता" है, अर्थात् किस कालातीत तत्त्व में समय स्वयं विलीन होता है, वही सच्चा वेद-ज्ञाता कहलाता है।

इस अध्याय का सार

अज्ञानवश आत्मा स्वयं को शरीर और गुणों के साथ तादात्म्य कर बैठती है, जैसे पक्षी जाल में स्वयं फँस जाए — परन्तु काल भी अंततः उस कालातीत ब्रह्म में ही विलीन हो जाता है।

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बुद्धि का संसर्ग और शुद्धिकरण का मार्ग (प्रपाठक 3)

तीसरा प्रपाठक भूतात्मा के बंधन के तंत्र को और गहराई से स्पष्ट करता है — यह बताता है कि वास्तव में शुद्ध आत्मा स्वयं बंधन या दुःख का अनुभव नहीं करती, बल्कि बुद्धि (चित्त) के अत्यधिक सामीप्य के कारण वह बुद्धि के गुण-धर्मों को अपने ऊपर प्रतिबिम्बित कर लेती प्रतीत होती है — ठीक वैसे ही जैसे तपाया हुआ लौह-गोला अग्नि के गुणों को धारण कर लेता है, यद्यपि वह वास्तव में लोहा ही रहता है, अग्नि नहीं बनता। यह उपमा अत्यन्त सटीक है — यह दिखाती है कि आत्मा का बंधन वास्तविक नहीं, बल्कि प्रतीत होने वाला (आभासिक) है, जो निकटता और सम्पर्क के कारण उत्पन्न होता है।

इस भ्रामक बंधन से मुक्ति के लिए उपनिषद् एक क्रमिक साधना-मार्ग प्रस्तुत करती है — अपनी शाखा के वेद का अध्ययन, अपने आश्रम और वर्ण के अनुरूप विहित कर्तव्यों का यथाविधि पालन। इन कर्तव्यों की उपेक्षा न करने से साधक उत्तम अवस्था को, और अंततः ब्रह्म-लोक तक की प्राप्ति को अर्जित करता है — ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। यह शिक्षा दिखाती है कि मैत्री उपनिषद्, अपनी गहन दार्शनिक चर्चाओं के बावजूद, विहित कर्तव्य-पालन के महत्त्व को नकारती नहीं, बल्कि उसे आत्म-शुद्धि की प्रारम्भिक, अनिवार्य सीढ़ी मानती है।

जो व्यक्ति सत्त्व-गुण से युक्त होता है, वह अपने ही सत्कर्मों से चमक उठता है — शनैः-शनैः यह शुद्ध हुआ भूतात्मा, विभिन्न साधना-चरणों से गुज़रते हुए, ध्यान के माध्यम से ब्रह्म-अवस्था की ओर आरोहण करता है। यह क्रमिक शुद्धिकरण की प्रक्रिया योग और वेदान्त, दोनों परम्पराओं में समान रूप से महत्त्वपूर्ण मानी गई है — यह दिखाती है कि आत्म-साक्षात्कार किसी अचानक, अकारण घटना का नाम नहीं, बल्कि निरंतर, अनुशासित प्रयास से क्रमशः प्रकट होने वाली अवस्था है।

इस प्रपाठक की गहन शिक्षा यह है कि दोष कभी आत्मा में नहीं होता — दोष सदा उस सम्पर्क, उस निकटता में होता है जो आत्मा और बुद्धि के बीच अज्ञानवश स्थापित हो जाती है। जिस दिन साधक इस भेद को स्पष्ट रूप से पहचान लेता है — "मैं बुद्धि नहीं, बुद्धि का साक्षी हूँ" — उसी दिन से उसकी साधना की दिशा मौलिक रूप से बदल जाती है, क्योंकि अब वह अपने दोषों को मिटाने का प्रयत्न नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक, सदा-शुद्ध पहचान को स्मरण करने का अभ्यास करता है।

इस अध्याय का सार

जैसे तपा हुआ लौह-गोला अग्नि के गुण धारण कर लेता है फिर भी लोहा ही रहता है, वैसे ही आत्मा बुद्धि के सामीप्य से दुःख का आभास लेती है, परन्तु वास्तव में सदा शुद्ध, अबद्ध ही रहती है।

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त्रिगुणातीत होने का मार्ग (प्रपाठक 4)

चौथा प्रपाठक तीनों गुणों — सत्त्व, रज, तम — के लक्षणों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है, यह दिखाते हुए कि किस प्रकार प्रत्येक गुण मनुष्य के स्वभाव, कर्म और अंततः उसकी नियति को आकार देता है। तमोगुण की प्रधानता क्रोध, मोह, लोभ और अंधकारमय कर्मों में प्रकट होती है; रजोगुण की प्रधानता कर्मों के प्रति आसक्ति, संग्रह की इच्छा और अशांत गतिविधि में; और सत्त्वगुण की प्रधानता शुद्धता, शांति और स्पष्टता में। यह त्रिगुण-विश्लेषण मनुष्य की मनोवृत्तियों को समझने के लिए एक अत्यन्त व्यावहारिक ढाँचा प्रस्तुत करता है, जो आगे भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय में और भी विस्तृत रूप से विकसित हुआ।

परन्तु उपनिषद् की गहनतम शिक्षा यह है कि साधना का अंतिम लक्ष्य केवल तम और रज से सत्त्व की ओर बढ़ना नहीं, बल्कि तीनों गुणों से ही सर्वथा ऊपर उठ जाना है — "त्रिगुणातीत" होना। यद्यपि सत्त्व गुण निश्चय ही श्रेष्ठ और वांछनीय है, यह भी अंततः प्रकृति का ही एक रूप है, और जब तक साधक स्वयं को प्रकृति के किसी भी विकार के साथ पहचानता रहता है, वह पूर्ण मुक्ति से वंचित रहता है। यह सूक्ष्म भेद — अच्छे गुण और गुण-रहित अवस्था के बीच का भेद — साधना-मार्ग की एक महत्त्वपूर्ण, प्रायः अनदेखी की जाने वाली सीढ़ी है।

उपनिषद् बताती है कि सच्चा पुरुष (आत्मा), ज्ञान के प्रति समर्पण और मन के संयम के द्वारा, इन गुणों से परे जाकर उस अक्षर (अविनाशी) आत्मा के साथ एकाकार हो जाता है। यह प्रक्रिया केवल बौद्धिक समझ से सम्पन्न नहीं होती — इसके लिए सतत अभ्यास, इन्द्रिय-संयम और गहन ध्यान आवश्यक है, जिससे साधक धीरे-धीरे अपनी पहचान को शरीर, मन और बुद्धि की तरंगों से हटाकर उस अपरिवर्तनशील साक्षी तक स्थिर कर पाता है।

यह त्रिगुणातीत अवस्था वेदान्त और योग, दोनों परम्पराओं में मुक्ति की अंतिम कसौटी मानी गई है — जब तक साधक किसी भी गुण, चाहे वह कितना भी शुभ क्यों न हो, से अपनी पहचान जोड़े रखता है, तब तक वह सूक्ष्म रूप से प्रकृति के चक्र में बँधा रहता है। केवल जब वह गुणों के इस खेल को, स्वयं से पृथक्, केवल एक दृश्य के रूप में देखने लगता है, तभी वह वास्तविक अर्थों में मुक्त कहलाता है।

इस अध्याय का सार

सत्त्व गुण भी अंततः प्रकृति का ही एक रूप है — साधना का अंतिम लक्ष्य अच्छे गुणों को अपनाना नहीं, बल्कि तीनों गुणों से ही सर्वथा ऊपर उठकर अपरिवर्तनशील साक्षी बन जाना है।

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पुरुष और प्रकृति का रहस्य (प्रपाठक 5)

पाँचवाँ प्रपाठक, जो उपनिषद् के पूरक भाग का आरम्भ करता है, अक्षर (अविनाशी) और क्षर (नाशवान) तत्त्वों के बीच के भेद को और गहराई से विश्लेषित करता है। यह भाग विशेष रूप से यह प्रतिपादित करने का प्रयत्न करता है कि सम्पूर्ण दृश्य जगत् — यहाँ तक कि सृजन, पालन और संहार जैसी ब्रह्माण्डीय प्रक्रियाएँ भी — उन्हीं तीन गुणों के ही विस्तार हैं, जो सृष्टि के आरम्भ से अंत तक अपना खेल खेलते रहते हैं। इस भाग की एक विशेषता यह है कि यह गुण-सिद्धान्त को ब्रह्माण्डीय देवत्व की भाषा में भी व्यक्त करने का प्रयत्न करता है, यह दर्शाते हुए कि सृजन, स्थिति और संहार की शक्तियाँ भी अंततः उसी एक परम तत्त्व की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।

इस प्रपाठक में सूर्य में स्थित पुरुष और व्यक्ति के भीतर स्थित आत्मा के बीच के अभिन्न सम्बन्ध पर पुनः बल दिया जाता है — जैसे अन्य कई उपनिषदों में देखा गया, यहाँ भी "जो वह सूर्य में है, वही यह मुझमें है" की भावना दोहराई जाती है, यह पुष्टि करते हुए कि बाह्य ब्रह्माण्ड और आंतरिक चेतना के बीच कोई मौलिक भेद नहीं है। साधक को यह शिक्षा दी जाती है कि वह स्वयं को क्षर तत्त्वों (प्रकृति के परिवर्तनशील रूपों) से पृथक्, अक्षर तत्त्व के साथ पहचाने।

यह भाग उन साधकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो गुण-सिद्धान्त और ब्रह्माण्ड-विज्ञान के बीच के सम्बन्ध को समझना चाहते हैं — यह दिखाता है कि मैत्री उपनिषद् की दृष्टि में, आध्यात्मिक मनोविज्ञान (गुणों का विश्लेषण) और ब्रह्माण्ड-विज्ञान (सृष्टि की प्रक्रिया) कोई पृथक् विषय नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो पहलू हैं — जो शक्तियाँ हमारे भीतर स्वभाव और वृत्ति के रूप में कार्य करती हैं, वही शक्तियाँ ब्रह्माण्ड में सृजन, पालन और संहार के रूप में कार्य करती हैं।

इस प्रपाठक का अंतिम सन्देश यह है कि जो साधक क्षर और अक्षर के इस भेद को स्पष्टतः समझ लेता है, वह गुणों के खेल में उलझे रहने के बजाय, उस अपरिवर्तनशील तत्त्व के साथ अपनी पहचान स्थापित कर लेता है, जो सृष्टि, स्थिति और संहार — तीनों प्रक्रियाओं का साक्षी होते हुए भी, इनमें से किसी से भी अप्रभावित रहता है।

इस अध्याय का सार

सृजन, पालन और संहार की ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ भी अंततः उन्हीं गुणों का विस्तार हैं जो हमारे भीतर स्वभाव के रूप में कार्य करते हैं — जो इस अभिन्नता को समझ लेता है, वह गुणों के खेल से ऊपर उठ जाता है।

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षडंग योग — छह अंगों वाला योग-मार्ग (प्रपाठक 6)

छठा प्रपाठक मैत्री उपनिषद् का सर्वाधिक व्यावहारिक और ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली भाग है, क्योंकि यहाँ योग-साधना की एक सुव्यवस्थित, छह अंगों वाली पद्धति प्रस्तुत की गई है, जो आगे के पतंजलि-योगदर्शन से भी प्राचीन या समकालीन मानी जाती है। यह "षडंग योग" इस प्रकार है — प्राणायाम (श्वास का नियमन), प्रत्याहार (इन्द्रियों को विषयों से हटाना), ध्यान (एकाग्र चिंतन), धारणा (चित्त को किसी एक बिंदु पर स्थिर करना), तर्क (गहन, विवेकपूर्ण विचार-मनन), और समाधि (पूर्ण तल्लीनता) — इन छह चरणों के क्रमिक अभ्यास से साधक ब्रह्म-साक्षात्कार तक पहुँचता है।

यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इस सूची में "तर्क" (दार्शनिक विवेचन, युक्तिपूर्ण चिंतन) को भी योग के एक अनिवार्य अंग के रूप में सम्मिलित किया गया है — यह पतंजलि के अष्टांग योग से भिन्न है, जिसमें यम-नियम-आसन जैसे नैतिक और शारीरिक अनुशासन प्रमुख हैं। मैत्री उपनिषद् का यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय परम्परा में योग केवल शारीरिक या ध्यान-सम्बन्धी अभ्यास तक सीमित नहीं था, बल्कि तर्कपूर्ण, विवेकपूर्ण चिंतन भी उतना ही आवश्यक अंग माना जाता था — भावना और बुद्धि, दोनों को समान महत्त्व दिया गया।

इसी प्रपाठक में सूर्य और आंतरिक प्राण के बीच के गहन सम्बन्ध पर भी विस्तार से चर्चा होती है — बाह्य सूर्य, जो उदय और अस्त होता है, और शरीर के भीतर कार्यरत प्राण, दोनों को एक ही मूल शक्ति की दो अभिव्यक्तियों के रूप में देखा जाता है। साधक को सिखाया जाता है कि वह अपने भीतर के प्राण को उसी श्रद्धा और सजगता से देखे जिससे वह बाह्य सूर्य को देखता है — यह आंतरिक-बाह्य समीकरण साधना को अधिक जीवंत, अधिक प्रत्यक्ष अनुभव बना देता है।

इस प्रपाठक की व्यावहारिक शिक्षा यह है कि आध्यात्मिक साधना कोई एकरेखीय प्रक्रिया नहीं — इसमें श्वास-नियमन जैसा शारीरिक अनुशासन, इन्द्रिय-संयम जैसा मानसिक अनुशासन, और तर्क जैसा बौद्धिक अनुशासन — सभी का समावेश आवश्यक है, तभी साधक समाधि की उस अंतिम अवस्था तक पहुँच पाता है, जहाँ द्रष्टा, दर्शन और दृश्य — तीनों का भेद विलीन हो जाता है।

इस अध्याय का सार

प्राणायाम से समाधि तक के छह चरणों में "तर्क" (विवेकपूर्ण चिंतन) को भी सम्मिलित करना मैत्री उपनिषद् की विशिष्ट देन है — योग यहाँ केवल भावना नहीं, बुद्धि और भावना का समन्वित अनुशासन है।

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उपसंहार — शास्त्र की श्रेष्ठता और मुक्ति का सन्देश (प्रपाठक 7)

सातवाँ और अंतिम प्रपाठक उपनिषद् के उपसंहार के रूप में कार्य करता है, जिसमें पूर्व में दी गई शिक्षाओं का सार संकलित करते हुए कुछ अतिरिक्त विषयों की चर्चा भी की गई है। यह भाग विशेष रूप से इस बात पर बल देता है कि आत्म-ज्ञान ही समस्त कर्मकाण्डों और लौकिक उपलब्धियों से श्रेष्ठ है — जो साधक इस ज्ञान के बिना केवल बाह्य अनुष्ठानों में उलझा रहता है, वह अंततः अपने वास्तविक लक्ष्य से वंचित रह जाता है। मैत्री उपनिषद् की एक विशेषता यह है कि इसमें अन्य कुछ विचारधाराओं की सीमाओं की ओर भी संकेत मिलता है, जो इसे परवर्ती, अधिक विवादास्पद युग की रचना होने का प्रमाण देता प्रतीत होता है — यह भाग सतही, केवल बाह्य वेश या तर्क-वितर्क पर आधारित ज्ञान-दावों के प्रति सावधान करता है, और वास्तविक, अनुभवजन्य आत्म-साक्षात्कार पर बल देता है।

उपनिषद् पुनः इस बात की पुष्टि करती है कि सच्चा ज्ञान न तो केवल शास्त्र-पाठ से, न ही केवल तर्क-वितर्क से, बल्कि गुरु के मार्गदर्शन में सतत साधना और आंतरिक अनुभूति से ही प्राप्त होता है। यह उन साधकों को चेतावनी देती है जो आधे-अधूरे ज्ञान से संतुष्ट होकर स्वयं को ज्ञानी मान बैठते हैं — यह भाव अन्य उपनिषदों, विशेषकर केन उपनिषद् के "जो सोचता है कि वह जानता है, वह नहीं जानता" वाले सिद्धान्त से गहराई से मेल खाता है।

इस प्रपाठक में साधक को यह भी स्मरण कराया जाता है कि शरीर, चाहे वह कितना भी अस्थायी और असार क्यों न हो, आत्म-साक्षात्कार का एकमात्र माध्यम भी है — इसलिए इसे न तो अत्यधिक भोग में डुबोना चाहिए, न ही अनुचित पीड़ा देनी चाहिए, बल्कि इसे साधना के एक उपकरण के रूप में सम्यक् रूप से बनाए रखना चाहिए। यह संतुलित दृष्टिकोण मैत्री उपनिषद् के प्रारम्भिक, तीव्र वैराग्य-भाव को एक परिपक्व, व्यावहारिक साधना-दर्शन में परिणत कर देता है।

उपनिषद् का समापन मुक्ति की महिमा के साथ होता है — जो साधक इस सम्पूर्ण शिक्षा को आत्मसात् कर, गुणों से परे जाकर, षडंग योग का अभ्यास करते हुए अपने वास्तविक, अक्षर स्वरूप को पहचान लेता है, वह राजा बृहद्रथ की भाँति ही, संसार-रूपी सूखे कुएँ से सदा के लिए बाहर निकल आता है। इस प्रकार मैत्री उपनिषद्, एक राजा की गहन वैराग्य-वेदना से आरम्भ होकर, गुण-विश्लेषण, काल-सिद्धान्त और षडंग योग की व्यावहारिक साधना-पद्धति से गुज़रते हुए, अंततः उसी शाश्वत, अक्षर आत्म-तत्त्व की प्राप्ति पर समाप्त होती है, जिसकी खोज में राजा ने अपना सिंहासन तक त्याग दिया था।

इस अध्याय का सार

आधा-अधूरा ज्ञान लेकर स्वयं को ज्ञानी मान बैठना सबसे बड़ा भ्रम है — सच्चा ज्ञान गुरु के मार्गदर्शन में सतत साधना और प्रत्यक्ष अनुभूति से ही प्राप्त होता है, शास्त्र-पाठ या तर्क-वितर्क मात्र से नहीं।