अथर्ववेद · १२ मंत्र

माण्डूक्य उपनिषद्

सबसे छोटा उपनिषद् — केवल ॐ के तीन मात्राओं में जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय — चारों अवस्थाओं का सम्पूर्ण रहस्य।

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ॐ ही सब कुछ है (मंत्र 1–2)

माण्डूक्य उपनिषद्, अथर्ववेद से सम्बद्ध, केवल बारह छोटे-छोटे मंत्रों की रचना है — दस मुख्य उपनिषदों में सबसे संक्षिप्त, फिर भी अद्वैत वेदान्त के इतिहास में सबसे अधिक प्रभावशाली मानी जाती है। गौड़पादाचार्य ने इस पर जो "कारिका" (विस्तृत पद्य-भाष्य) लिखी, वह स्वयं शंकराचार्य के गुरु के गुरु गौड़पाद की अद्वैत-दृष्टि की आधारशिला बनी, और आगे शंकराचार्य ने इसी परम्परा को समग्र वेदान्त-दर्शन का शिखर बनाया। इतने छोटे ग्रन्थ का इतना गहरा प्रभाव अपने आप में विस्मयकारी है।

उपनिषद् इस उद्घोष से आरम्भ होती है — "ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव। यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव॥" — ॐ यह अक्षर ही यह सब कुछ है; इसकी व्याख्या यह है — जो भूत है, जो वर्तमान है, जो भविष्य है, वह सब ॐकार ही है; और जो कुछ तीनों कालों से परे है, वह भी ॐकार ही है। यह घोषणा अत्यन्त साहसिक है — एक साधारण, एकाक्षर ध्वनि को सम्पूर्ण अस्तित्व, समस्त समय और समय से परे के तत्त्व के साथ पूर्णतः समीकृत कर दिया गया है।

दूसरा मंत्र इस समीकरण का आधार स्पष्ट करता है — "सर्वं ह्येतद्ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात्॥" — यह सब कुछ ब्रह्म है; यह आत्मा ब्रह्म है; और यही आत्मा चार पादों (चरणों) वाला है। यह मंत्र उपनिषद् की सम्पूर्ण संरचना की कुंजी है — शेष दस मंत्र इसी "चतुष्पाद आत्मा" के चार चरणों का क्रमिक विश्लेषण करेंगे, और साथ ही यह दिखाएँगे कि किस प्रकार ॐ की ध्वनि-रचना (अ-उ-म-मौन) भी इन्हीं चार चरणों से पूर्णतः मेल खाती है।

इस लघु किन्तु सघन आरम्भ में ही माण्डूक्य उपनिषद् की मौलिक पद्धति स्पष्ट हो जाती है — यह ब्रह्म को किसी दूरस्थ, अमूर्त सिद्धान्त के रूप में नहीं, बल्कि साधक की अपनी ही चेतना की चार अवस्थाओं में सीधे प्रत्यक्ष कराने का प्रयास करती है। जब तक आत्मा को कोई बाह्य वस्तु समझा जाता रहेगा, वह सदा खोज का विषय बना रहेगा; परन्तु जब साधक यह पहचान लेता है कि प्रतिदिन अनुभव होने वाली जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ स्वयं उसी आत्मा के चरण हैं, तो आत्म-ज्ञान दूर की कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षण की प्रत्यक्ष अनुभूति बन जाता है।

इस अध्याय का सार

ॐ केवल एक ध्वनि नहीं, समस्त भूत-वर्तमान-भविष्य और समय से परे का तत्त्व है — और वही आत्मा, जो चार चरणों में स्वयं को प्रकट करता है, वही ब्रह्म है।

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तीन साधारण अवस्थाएँ — जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति (मंत्र 3–6)

तीसरा मंत्र आत्मा के प्रथम चरण का वर्णन करता है — "जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविꣳशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः॥" — जाग्रत अवस्था में स्थित, बाह्य वस्तुओं को जानने वाला, सात अंगों और उन्नीस मुखों (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार) वाला, स्थूल पदार्थों को भोगने वाला — यह वैश्वानर नामक प्रथम चरण है। यह वह अवस्था है जिसमें हम प्रतिदिन जागकर बाह्य जगत् का अनुभव करते हैं, जहाँ चेतना बाहर की ओर, इन्द्रियों के माध्यम से स्थूल वस्तुओं की ओर उन्मुख रहती है।

चौथा मंत्र दूसरे चरण का वर्णन करता है — "स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविꣳशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः॥" — स्वप्न-अवस्था में स्थित, आंतरिक वस्तुओं को जानने वाला, वही सात अंग और उन्नीस मुख रखने वाला, परन्तु अब सूक्ष्म वस्तुओं को भोगने वाला — यह तैजस नामक द्वितीय चरण है। स्वप्न में चेतना बाह्य जगत् से हटकर मन के भीतर ही अपनी दुनिया रचती है — यहाँ इन्द्रियाँ शांत रहती हैं, परन्तु मन स्वयं ही दृश्य, ध्वनि, अनुभव सब कुछ गढ़ लेता है, जो जाग्रत अवस्था में संचित संस्कारों से ही निर्मित होते हैं।

पाँचवाँ मंत्र तीसरे चरण, गहरी निद्रा का वर्णन करता है — "यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम्। सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः॥" — जहाँ सोया हुआ व्यक्ति न किसी वस्तु की कामना करता है, न कोई स्वप्न देखता है, वह सुषुप्ति है; इस अवस्था में स्थित, एकीभूत, ज्ञान-घन, आनन्दमय, आनन्द भोगने वाला, चेतना का द्वार — यह प्राज्ञ नामक तृतीय चरण है। यह अत्यन्त उल्लेखनीय है कि गहरी निद्रा को यहाँ "आनन्दमय" कहा गया है — यद्यपि जागने पर हमें इसका कोई स्मरण नहीं रहता, फिर भी हम सब यह अनुभव जानते हैं कि गहरी, स्वप्न-रहित नींद के बाद हम अधिक तरोताज़ा, अधिक शांत अनुभव करते हैं, यह इस बात का सूक्ष्म प्रमाण है कि उस अवस्था में हम अपने ही आनंद-स्वरूप के निकटतम पहुँच जाते हैं।

छठा मंत्र प्राज्ञ की व्याख्या करता है कि यही तीनों अवस्थाओं का ईश्वर (सर्वेश्वर), सर्वज्ञ (सर्वज्ञ), अंतर्यामी (सबका आंतरिक नियन्ता), और सबकी उत्पत्ति व लय का स्थान (योनि) है। यहाँ एक महत्वपूर्ण सूक्ष्मता निहित है — प्राज्ञ अवस्था में ज्ञान पूर्णतः "घनीभूत" हो जाता है, अर्थात् विषय-विषयी का भेद मिट जाता है, परन्तु यह अभी भी अज्ञान का एक प्रकार का बीज-रूप है (कारण-शरीर), क्योंकि जागने पर पुनः वही व्यक्ति संसार में लौट आता है। इसीलिए उपनिषद् आगे एक चौथी अवस्था की ओर इशारा करती है, जो इन तीनों से भी परे है।

इस अध्याय का सार

जाग्रत में हम स्थूल जगत् भोगते हैं, स्वप्न में सूक्ष्म मानसिक जगत्, और सुषुप्ति में हम अपने ही आनन्द-स्वरूप के निकटतम पहुँचते हैं — फिर भी यह तीनों अवस्थाएँ अंतिम सत्य नहीं, केवल उसकी ओर संकेत हैं।

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तुरीय — चौथी अवस्था, मौन का साम्राज्य (मंत्र 7)

सातवाँ मंत्र सम्पूर्ण उपनिषद् का शिखर है, जो "तुरीय" (चतुर्थ) अवस्था का वर्णन करता है — "नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः॥" — यह न आंतरिक ज्ञान है, न बाह्य ज्ञान, न दोनों का मिश्रण, न ज्ञान का घनीभूत रूप, न ज्ञान है, न अज्ञान; यह अदृश्य है, व्यवहार से परे है, ग्रहण न किया जा सकने वाला है, लक्षण-रहित है, अचिन्त्य है, किसी नाम से निर्दिष्ट न किया जा सकने वाला है, केवल एक आत्मा में प्रतीति ही जिसका सार है, समस्त प्रपंच (जगत्-विस्तार) का उपशम (शांत हो जाना) है, शांत है, शिव (कल्याणकारी) है, अद्वैत है — इसे ही चतुर्थ (तुरीय) मानते हैं; यही आत्मा है, यही जानने योग्य है।

यह मंत्र अपनी संरचना में ही एक विशेष तकनीक अपनाता है — यह तुरीय को किसी सकारात्मक विशेषण से परिभाषित करने के बजाय, निरंतर निषेध ("न यह, न वह") की शृंखला से घेरता है, जिसे वेदांत में "नेति-नेति" पद्धति कहा जाता है। इसका कारण स्पष्ट है — तुरीय कोई चौथी "अवस्था" नहीं है, जो जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति के समकक्ष गिनी जा सके; यह तो वह चेतना है जो इन तीनों अवस्थाओं में समान रूप से, अपरिवर्तित रूप से उपस्थित रहती है, उन्हें सम्भव बनाती है, परन्तु स्वयं कभी उनमें परिवर्तित नहीं होती।

इसे समझने के लिए एक सरल दृष्टांत सहायक है — जिस प्रकार एक ही विद्युत-शक्ति पंखे में घूमने, बल्ब में प्रकाश देने, और हीटर में ऊष्मा देने के रूप में प्रकट होती है, फिर भी विद्युत स्वयं न घूमती है, न चमकती है, न गर्म होती है — वह इन तीनों क्रियाओं का आधार है, परन्तु स्वयं उनसे परे है। ठीक इसी प्रकार तुरीय वह चेतना है जो जाग्रत में देखने, स्वप्न में कल्पना करने, और सुषुप्ति में विश्राम करने की शक्ति देती है, परन्तु स्वयं देखती, कल्पना करती, या विश्राम नहीं करती — वह केवल शुद्ध, साक्षी-रूप में सदा उपस्थित रहती है।

"प्रपञ्चोपशमम्" शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है — इसका अर्थ है वह अवस्था जहाँ जगत्-विस्तार का समस्त कोलाहल शांत हो जाता है। यह किसी शून्यता या अभाव की स्थिति नहीं, बल्कि पूर्णता की चरम अवस्था है — "शान्तं शिवम् अद्वैतम्" — शांत, कल्याणकारी, अद्वैत। यही वह अवस्था है जिसकी खोज में सम्पूर्ण उपनिषद्-साहित्य निरंतर प्रवृत्त रहा है, और माण्डूक्य उपनिषद् इसे सबसे संक्षिप्त, सबसे सटीक शब्दों में परिभाषित करने का साहस करती है।

इस अध्याय का सार

तुरीय कोई चौथी अवस्था नहीं, बल्कि वह साक्षी-चेतना है जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति — तीनों में समान रूप से उपस्थित रहकर उन्हें सम्भव बनाती है, परन्तु स्वयं कभी परिवर्तित नहीं होती।

4

ॐ के तीन मात्राएँ और मौन (मंत्र 8–12)

अंतिम भाग में उपनिषद् एक अद्भुत संश्लेषण प्रस्तुत करती है — वह ॐ की ध्वनि-रचना को आत्मा की चार अवस्थाओं के साथ ठीक-ठीक जोड़ देती है। ॐ तीन मात्राओं — अ, उ, म — से बना है, और इन तीनों मात्राओं के साथ-साथ एक चौथा, अमात्र (मात्रा-रहित) तत्त्व भी है, जो शब्द के उच्चारण के बाद फैलने वाले मौन में अनुभव होता है। यह संरचना इतनी सुव्यवस्थित है कि इसे संयोग नहीं माना जा सकता — प्रत्येक मात्रा एक विशेष अवस्था का प्रतीक बनकर उभरती है।

"अ" मात्रा वैश्वानर (जाग्रत) से जुड़ी है, क्योंकि यह "आपत्ति" (आरम्भ) और "आदिमत्त्व" (सबसे पहला होना) का सूचक है — जिस प्रकार "अ" ध्वनि सभी स्वरों का आदि है, उसी प्रकार जाग्रत अवस्था अनुभव की शृंखला का आरम्भ-बिंदु है। जो साधक इस सम्बन्ध को भली-भाँति जान लेता है, वह अपनी समस्त इच्छाओं को पूर्ण करता हुआ श्रेष्ठ बन जाता है। "उ" मात्रा तैजस (स्वप्न) से जुड़ी है, क्योंकि यह "उत्कर्ष" (उन्नति) और "उभयत्व" (दोनों के बीच होना) का सूचक है — जैसे "उ" ध्वनि "अ" और "म" के बीच सेतु बनती है, वैसे ही स्वप्न-अवस्था जाग्रत और सुषुप्ति के बीच की कड़ी है। इसे जानने वाला ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाता है, समान भाव वाला बनता है, और उसके परिवार में कोई भी ब्रह्म-अज्ञानी उत्पन्न नहीं होता।

"म" मात्रा प्राज्ञ (सुषुप्ति) से जुड़ी है, क्योंकि यह "मिति" (मापन, अंत) और "अपीति" (विलय) का सूचक है — जैसे "म" ध्वनि पर शब्द का उच्चारण समाप्त हो जाता है, वैसे ही सुषुप्ति में सभी अनुभव उसी एक चेतना में समा जाते हैं। जो साधक इसे जानता है, वह इस सम्पूर्ण जगत् को माप लेता है (अर्थात् उसकी सीमाओं को समझ लेता है) और उसमें विलीन हो जाता है। परन्तु इन तीनों मात्राओं से परे, वह चौथा तत्त्व है — अमात्र, जो न किसी ध्वनि से मापा जा सकता है, न किसी व्यवहार से — यह तुरीय है, वह मौन जो शब्द के उच्चारण के पश्चात् शेष रह जाता है, और जिसमें सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच शांत होकर विलीन हो जाता है।

उपनिषद् के अंतिम मंत्र में यह घोषणा की जाती है कि जो साधक इस प्रकार ॐ को आत्मा के चार चरणों के साथ जानता है, वह अपने आत्मा से आत्मा में ही प्रवेश कर जाता है — "आत्मनाऽऽत्मानं प्रविशति" — यह एक अत्यन्त सुंदर वाक्यांश है, जो यह दर्शाता है कि आत्म-साक्षात्कार कहीं बाहर जाना नहीं, बल्कि अपने ही भीतर, अपनी ही गहराई में प्रवेश करना है। इस प्रकार यह लघुतम उपनिषद् एक ऐसी साधना-पद्धति प्रस्तुत करती है, जो प्रतिदिन के तीन साधारण अनुभवों — जागना, स्वप्न देखना, सोना — को ही आत्म-ज्ञान की सीढ़ी बना देती है, और एक ही पवित्र अक्षर, ॐ, में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और स्वयं के बीच के भेद को विलीन कर देती है।

इस अध्याय का सार

ॐ की तीन मात्राएँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का प्रतीक हैं, परन्तु उसके बाद फैलने वाला मौन ही तुरीय है — जो इसे जान लेता है, वह अपने ही आत्मा में, आत्मा के द्वारा प्रवेश कर जाता है।