ऋग्वेद · ४ अध्याय

कौषीतकि उपनिषद्

देवयान मार्ग पर आत्मा की यात्रा, प्राण-विद्या का उपदेश, इन्द्र-प्रतर्दन संवाद तथा गार्ग्य बालाकि को राजा अजातशत्रु का ब्रह्म-उपदेश।

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देवयान मार्ग — ब्रह्मलोक की यात्रा (अध्याय 1)

कौषीतकि उपनिषद्, ऋग्वेद से सम्बद्ध, अपनी प्राचीनता और गहनता में बृहदारण्यक और छान्दोग्य के समकक्ष मानी जाती है, यद्यपि यह दस मुख्य उपनिषदों में सम्मिलित नहीं है। इसका आरम्भ राजा चित्र गार्ग्यायणि की कथा से होता है — वे एक विशेष यज्ञ के लिए योग्य पुरोहित की खोज में श्वेतकेतु आरुणि से पूछते हैं कि क्या उनके पिता ने उन्हें यह सिखाया है कि मृत्यु के पश्चात् प्राणी कहाँ जाते हैं, और दो मार्ग किस प्रकार विभाजित होते हैं। श्वेतकेतु अनभिज्ञ होकर अपने पिता उद्दालक के पास लौटते हैं, परन्तु उद्दालक स्वयं भी इसका उत्तर नहीं जानते — दोनों पिता-पुत्र चित्र के पास जाकर विनम्रतापूर्वक शिष्य बन जाते हैं, यह दिखाते हुए कि ज्ञान की खोज में कुल-गौरव कोई बाधा नहीं।

चित्र समझाते हैं कि इस लोक से प्रस्थान करने वाले समस्त प्राणी पहले चन्द्रलोक में पहुँचते हैं — शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा उनका भोजन ग्रहण करता है (अर्थात् उन्हें पुष्ट करता है), और कृष्ण पक्ष में वह उन्हें पुनर्जन्म के लिए प्रेरित करता है। चन्द्रमा स्वर्ग-लोक का द्वार है — जो साधक उसके प्रश्नों का उचित उत्तर दे पाते हैं, वे आगे बढ़ जाते हैं; शेष वर्षा बनकर पुनः पृथ्वी पर लौट आते हैं, अपने कर्मों और ज्ञान के अनुसार कीट, मत्स्य, पक्षी, सिंह, शूकर, सर्प, व्याघ्र या मनुष्य आदि विविध योनियों में जन्म लेते हैं।

परन्तु जो साधक पंचाग्नि विद्या को जानते हैं, अथवा वन में तप और श्रद्धा का पालन करते हैं, वे देवयान मार्ग से — अग्नि, दिन, शुक्ल पक्ष, उत्तरायण के छह महीने, वर्ष, सूर्य, चन्द्रमा और अंततः विद्युत के द्वार से होकर — ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं, और पुनः संसार में नहीं लौटते। इसके पश्चात् एक अत्यन्त विलक्षण, काव्यात्मक वर्णन आता है — ब्रह्मलोक पहुँचकर साधक "अपराजिता" नामक सभा-भवन, "विभु" नामक ब्रह्मा के महल में प्रवेश करता है, जहाँ "अमितौजा" नामक आसन पर विराजमान स्वयं ब्रह्मा उससे पूछते हैं — "तुम कौन हो?"

इस प्रश्न का सही उत्तर एक विस्तृत, गहन आत्म-घोषणा है — "मैं ऋतु हूँ, ऋतुओं से उत्पन्न हूँ; मैं आकाश की कोख से, पत्नी के वीर्य के रूप में, वर्ष के तेज के रूप में, प्रत्येक प्राणी के आत्मा के रूप में उत्पन्न हुआ; तू प्रत्येक प्राणी का आत्मा है, जो तू है, वही मैं हूँ।" ब्रह्मा तब पूछते हैं — "मैं कौन हूँ?" — और सही उत्तर है — "सत्य" (परम सत्य)। इस पहचान के पश्चात् साधक का ब्रह्मलोक में भव्य स्वागत होता है — पाँच सौ अप्सराएँ उसे घेर लेती हैं, वह मन से ही "अर" नामक सरोवर पार करता है, समस्त कामनाओं को प्राप्त कर, दिव्य आभूषणों से सुसज्जित होकर, अंततः स्वयं ब्रह्मा के आसन तक पहुँचकर महान गौरव प्राप्त करता है।

इस अध्याय का सार

ब्रह्मलोक के द्वार पर पूछे गए प्रश्न "तुम कौन हो" का सही उत्तर आत्म-पहचान ही है — "जो तू है, वही मैं हूँ" — यह पहचान ही साधक को उस भव्य, अंतिम गंतव्य तक ले जाती है।

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प्राण ही ब्रह्म है — आंतरिक अग्निहोत्र (अध्याय 2)

दूसरा अध्याय प्राण को सीधे ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित करता है — "प्राणो ब्रह्मेति" — कौषीतकि ऋषि कहते हैं, प्राण ही ब्रह्म है। मन प्राण का दूत है, दृष्टि उसकी रक्षक है, वाणी उसकी दासी है, और श्रवण उसका सूचना-वाहक है — प्राण ही इन सबमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है, ठीक वैसे ही जैसे प्रश्न उपनिषद् और छान्दोग्य उपनिषद् में भी प्राण की सर्वोच्चता प्रतिपादित हुई थी। यहाँ प्राण को धन का दाता भी कहा गया है, क्योंकि यह सब कुछ प्राण पर ही निर्भर करता है — जो साधक प्राण का सम्मान करता है, समृद्धि उसका अनुसरण करती है।

इस अध्याय में कौषीतकि अपने पुत्र को एक असाधारण शिक्षा देते हैं — बाह्य अग्निहोत्र (यज्ञ-अग्नि में आहुति देने की विधि) के स्थान पर एक आंतरिक अग्निहोत्र का अभ्यास करने की शिक्षा। जब कोई भोजन करता या जल पीता है, तो उसे यह भाव रखना चाहिए कि वह प्राण को ही आहुति दे रहा है, वाणी में प्राण को अर्पित कर रहा है — यह आंतरिक यज्ञ बाह्य कर्मकाण्ड से भी अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया, क्योंकि यह प्रतिपल, स्वाभाविक रूप से घटित होता है, न कि किसी विशेष अवसर पर ही।

उपनिषद् यह भी सिखाती है कि साधक को केवल मंत्रों को ही नहीं, बल्कि उस देवता को भी जानना चाहिए जिसमें वे मंत्र प्रतिष्ठित हैं, और उस व्यक्ति को भी जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं — केवल इसी समग्र ज्ञान से सच्ची विद्वत्ता प्राप्त होती है। यह शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण चेतावनी है — शब्दों और सूत्रों का यांत्रिक स्मरण ज्ञान नहीं है; सच्चा ज्ञान तभी है जब मंत्र, उसके देवता और उसके अर्थ के बीच की गहन एकता को समझ लिया जाए।

अध्याय के अंत में यह भी सिखाया गया है कि ज्ञानी व्यक्ति खोई हुई वस्तुओं या मृत सम्बन्धियों के लिए शोक नहीं करता, क्योंकि वह जानता है कि वह स्वयं, चेतना-रूप में, अखंड और अविभाज्य बना रहता है — आशा और स्मृति भी प्राण की ही शक्तियाँ हैं, जो साधक को विपत्ति के समय भी संतुलित रखती हैं। यह शिक्षा दिखाती है कि आत्म-ज्ञान का व्यावहारिक फल केवल मृत्यु के पश्चात् की मुक्ति नहीं, बल्कि इसी जीवन में शोक और विक्षोभ से ऊपर उठने की क्षमता भी है।

इस अध्याय का सार

बाह्य यज्ञ-अग्नि से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है वह आंतरिक अग्निहोत्र, जिसमें प्रत्येक श्वास और प्रत्येक भोजन को प्राण के प्रति समर्पित भाव से ग्रहण किया जाए — यही निरंतर, जीवंत उपासना है।

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इन्द्र-प्रतर्दन संवाद — कर्म से परे चेतना (अध्याय 3)

तीसरा अध्याय एक अत्यन्त असाधारण संवाद प्रस्तुत करता है — राजा प्रतर्दन, दिवोदास के पुत्र, अपने पराक्रम और तप के बल पर स्वयं इन्द्र के धाम तक पहुँच जाते हैं। इन्द्र, नचिकेता की कथा के यम की भाँति, उन्हें एक वर माँगने को कहते हैं। परन्तु प्रतर्दन एक असाधारण विनम्रता दिखाते हुए कहते हैं — "आप ही मेरे लिए वह वर चुनिए, जिसे आप मनुष्य के लिए सबसे कल्याणकारी समझें" — यह अपने-आप में गहन विश्वास और समर्पण का प्रतीक है।

इन्द्र पहले कहते हैं कि श्रेष्ठ, निम्न के लिए वर नहीं चुनता, स्वयं चुनो — परन्तु जब प्रतर्दन अडिग रहते हैं, इन्द्र सत्य से विचलित हुए बिना (क्योंकि इन्द्र स्वयं सत्य के प्रतीक माने गए हैं) कहते हैं — "मुझे ही जानो; मैं मानता हूँ कि मनुष्य के लिए सबसे कल्याणकारी यही है कि वह मुझे जाने।" इन्द्र तब अपने कुछ हिंसक कर्मों का उल्लेख करते हैं — त्वष्टा के त्रिशिरा पुत्र का वध, अरुणमुख तपस्वियों को भेड़ियों के सामने फेंकना, अनेक संधियों को तोड़ना — फिर भी घोषणा करते हैं कि इनमें से किसी कर्म से उनका एक बाल भी क्षतिग्रस्त नहीं हुआ।

यह चौंकाने वाला दावा वास्तव में एक गहन दार्शनिक सिद्धान्त प्रस्तुत करता है — जो व्यक्ति इन्द्र को, अर्थात् शुद्ध चेतना (प्रज्ञात्मा) को, अपने वास्तविक स्वरूप के रूप में पहचान लेता है, उसके कर्मों का फल उस चेतना को स्पर्श नहीं करता, चाहे वह चोरी करे, गर्भ-हत्या करे, या माता-पिता का वध भी क्यों न कर दे — उसका मुख महानतम पाप से भी कांतिहीन नहीं होता। यह सिद्धान्त अत्यन्त सूक्ष्म है — यह किसी नैतिक अराजकता का समर्थन नहीं करता, बल्कि यह दर्शाता है कि कर्म और उसका फल अनुभवजन्य, सीमित "मैं" (अहंकार) से सम्बद्ध है, न कि उस शुद्ध साक्षी-चेतना से जो सदा कर्मों से परे, अपरिवर्तित रहती है।

इन्द्र आगे स्वयं को प्राण, प्रज्ञात्मा, आयु और अमृत के रूप में उपासना करने की शिक्षा देते हैं — वे बताते हैं कि प्राण किस प्रकार निद्रा में शरीर की रक्षा करता है, और मृत्यु के समय भी वाणी, मन, दृष्टि और श्रवण को अपने भीतर समेटकर उन्हें नष्ट होने से बचाता है, ठीक वैसे ही जैसे एक प्रधानमंत्री राज्य के समस्त अधिकारियों का, उनके अपने-अपने कार्यों में, संरक्षण और मार्गदर्शन करता है। यह उपदेश केन उपनिषद् की भावना से मेल खाता है, परन्तु यहाँ यह स्वयं इन्द्र के, अर्थात् सक्रिय, यहाँ तक कि उग्र, देवता के मुख से आता है — यह दिखाते हुए कि शुद्ध चेतना-ज्ञान किसी शांत तपस्वी तक ही सीमित नहीं, बल्कि सबसे अधिक सक्रिय जीवन में भी सुलभ है।

इस अध्याय का सार

जो चेतना को, न कि क्षणिक कर्मों के समूह को, अपना वास्तविक स्वरूप मानता है, उसके कर्मों का फल उस शुद्ध साक्षी-चेतना को कभी स्पर्श नहीं करता — यही इन्द्र का प्रतर्दन को दिया गया सबसे साहसिक उपदेश है।

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अजातशत्रु का उपदेश — निद्रा में स्थित सत्य (अध्याय 4)

चौथा और अंतिम अध्याय बालाकि नामक विद्वान ब्राह्मण और काशी-नरेश अजातशत्रु के बीच के उसी प्रसिद्ध संवाद को प्रस्तुत करता है जो बृहदारण्यक उपनिषद् में भी मिलता है, यद्यपि यहाँ इसकी अपनी विशिष्ट शैली और विवरण हैं। बालाकि गर्वपूर्वक सूर्य में, चन्द्रमा में, बिजली में, आकाश में स्थित पुरुषों को क्रमशः ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत करते हैं, विशेष रूप से दाहिने नेत्र में स्थित पुरुष को "इन्ध" (प्रज्ज्वलित करने वाला) कहते हुए विशेष महत्त्व देते हैं। अजातशत्रु धैर्यपूर्वक प्रत्येक प्रस्ताव को सुनते हैं, परन्तु स्पष्ट कर देते हैं कि इनमें से कोई भी अंतिम ब्रह्म नहीं हो सकता।

एक विशेष रूप से रोचक शब्द-क्रीड़ा इस अध्याय में मिलती है — अजातशत्रु बताते हैं कि हृदय के भीतर स्थित आकाश में जो पुरुष है, उसे "इन्ध" से "इन्द्र" कहा जाता है, क्योंकि देवता भी परोक्ष-प्रिय (गूढ़ बातों को पसंद करने वाले) माने जाते हैं — "इन्ध" शब्द में "ह" जोड़ने से "इन्द्र" शब्द बनता है, और यही गूढ़ार्थ बताता है कि इन्द्र स्वयं इसी आंतरिक, प्रज्वलित चेतना का ही एक गुह्य नाम है। यह व्युत्पत्ति-आधारित शिक्षण-शैली उपनिषदों की एक विशेषता है, जहाँ भाषा के भीतर छिपे संकेतों से गहन तात्त्विक सत्य निकाले जाते हैं।

अंततः, बालाकि के मौन हो जाने पर, अजातशत्रु — पुनः एक क्षत्रिय द्वारा एक ब्राह्मण को सिखाए जाने का दृश्य — उसे एक सोए हुए व्यक्ति के पास ले जाकर प्रत्यक्ष प्रदर्शन देते हैं। वे दिखाते हैं कि गहरी निद्रा में जब वाणी, मन, दृष्टि और श्रवण अपने-अपने कार्यों से विश्राम ले लेते हैं, तब भी वह "प्राज्ञ आत्मा" (चेतना-स्वरूप आत्मा) जागृत रहती है, हृदय के आकाश में स्थित होकर इन सभी इन्द्रियों को नियंत्रित करती है — यही सच्चा ब्रह्म है, जो किसी बाह्य प्रतीक में नहीं, बल्कि प्रत्येक अनुभव के मूल आधार में विद्यमान है।

उपनिषद् का समापन एक व्यापक शिक्षा से होता है — जिस प्रकार एक उस्तरे को उसके ही खोल में सुरक्षित रखा जाता है, या जिस प्रकार आग को उसकी अपनी वेदी में समाहित माना जाता है, उसी प्रकार यह प्राज्ञ आत्मा शरीर के भीतर, ज्ञान की समस्त इन्द्रियों सहित, सुरक्षित रूप से स्थित रहती है। कौषीतकि उपनिषद् इस प्रकार देवयान की भव्य ब्रह्मलोक-यात्रा से आरम्भ होकर, आंतरिक अग्निहोत्र, इन्द्र के कर्मातीत चेतना-सिद्धान्त, और अंततः निद्रा में स्थित उसी शाश्वत साक्षी के प्रत्यक्ष प्रदर्शन तक — एक सम्पूर्ण, सुसंगत यात्रा पूर्ण करती है।

इस अध्याय का सार

जैसे उस्तरा अपने ही खोल में सुरक्षित रहता है, वैसे ही प्राज्ञ आत्मा शरीर के भीतर, इन्द्रियों के विश्राम में भी, सुरक्षित और जागृत रहती है — यही निद्रा के भीतर छिपा हुआ शाश्वत सत्य है।